करोड़ों की परियोजना, 3 किमी सड़क पर फेल सिस्टम: खुरजा में अधूरा पड़ा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर


सुरेन्द्र सिंह भाटी@बुलंदशहर। देश की सबसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में शामिल Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited की डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) योजना बुलंदशहर के खुरजा में अधूरी सोच की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। अरबों रुपये खर्च कर बनाया गया “न्यू खुरजा” स्टेशन आज बुनियादी सड़क के अभाव में लगभग बेकार साबित हो रहा है।


करीब एक लाख करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य माल ढुलाई को तेज और सस्ता बनाना था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्टेशन तक पहुंचने के लिए जरूरी करीब 3 किलोमीटर की कनेक्टिविटी रोड ही नहीं बन सकी। नतीजा—ट्रेन से माल तो आ सकता है, लेकिन आगे ढुलाई के लिए रास्ता नहीं है।
खुरजा का यह स्टेशन रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा था। पास में बन रहा Noida International Airport और Yamuna Expressway Industrial Development Authority की इंडस्ट्रियल सिटी इसे मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स हब बना सकते थे। योजना थी कि रेल और एयर कार्गो मिलकर क्षेत्र को आर्थिक ताकत देंगे। लेकिन सड़क न होने से पूरी योजना कागजों तक सीमित रह गई।






सूत्रों के अनुसार, कनेक्टिविटी रोड के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी। स्थानीय स्तर पर अधिकारियों ने मेहनत की, जमीन चिन्हित की गई, लेकिन जब फंड जारी होने की बारी आई तो दिल्ली स्तर पर प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। दो साल की मेहनत और सरकारी प्रक्रिया एक झटके में बेकार हो गई।
यह मामला सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि सिस्टम की उस खामी का है जहां हजारों करोड़ की परियोजनाएं तो बन जाती हैं, लेकिन आखिरी 2-3 किलोमीटर की प्लानिंग ही गायब रहती है। परिणाम—जनता को कोई सीधा लाभ नहीं और सरकारी धन की खुली बर्बादी।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी नहीं, बल्कि समग्र योजना और समन्वय की कमी सबसे बड़ी समस्या है। जब तक लास्ट माइल कनेक्टिविटी, जवाबदेही और जमीन से जुड़ी योजना को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसे “अधूरे विकास” की कहानियां सामने आती रहेंगी।


खुरजा का यह मामला साफ संकेत देता है, अगर सिस्टम नहीं बदला, तो करोड़ों के प्रोजेक्ट सिर्फ आंकड़ों में ही चमकते रहेंगे, जमीन पर नहीं।

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