कोरोना ने तोड दी आम आदमी की कमर

Spread the love

लाॅक डाउन के कारण छिन चुकी है लोगों की रोजी-रोटी
आधे वेतनमान पर काम करने पर मजबूर हो गए हैं लोग
दीपक वर्मा@ शामली। कोरोना को लेकर लागू किए गए लाॅक डाउन ने मेहनतकश लोगों की कमर तोड़कर रख दी है। कई लोगों की रोजी रोटी भी छिन गयी है वहीं कुछ लोग आधे वेतनमान पर ही काम करने के लिए मजबूर हो गए हैं। ऐसे लोगों के सामने अब आधे वेतन पर घर के खर्चों के साथ-साथ बच्चों की पढाई व अन्य चीजों से पडने वाला व्यय आने वाले समय में सिर का बोझ बन सकता है। काम धंधे चैपट हो जाने से लोग मानसिक रूप से भी परेशान नजर आ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार देश में कोरोना संकट को लेकर लागू किए गए लाॅक डाउन में काम धंधे बंद हो जाने से मेहनतकश लोगों की कमर टूट गयी है। काम न मिलने से उनकी रोजी-रोटी भी छिन गयी है, वहीं कुछ लोग आधे वेतन पर काम करने के लिए मजबूर हो गए हैं जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। जिले में हजारों लोग दिल्ली, करनाल, पानीपत आदि स्थानों पर फैक्ट्रियों में काम करते हैं लेकिन लाॅक डाउन के कारण फैक्ट्रियां बंद हो जाने से ऐसे लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खडा हो गया है। लाॅक डाउन में फंसे हजारों लोग पैदल ही किसी प्रकार भूखे प्यासे अपने-अपने घरों को तो पहुंच गए लेकिन अब उनके सामने काम धंधे की समस्या खडी हो गयी है। यही हालत शहर में भी दिखाई दे रही है। लाॅक डाउन के चलते बंद पडे कारोबार शुरू तो हो गए हैं लेकिन उनमें काम करने वाले श्रमिकों के वेतन पर इसका सीधा असर पडा है, कई दुकानदारों ने तो अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों से साफ कह दिया है कि अगर आधे वेतन पर काम करना हो तो करो, अन्यथा कोई दूसरा काम ढूंढ लो। दूसरे काम का विकल्प न होने पर बेबस कर्मचारी आधे वेतन पर ही काम करने पर मजबूर हो गए हैं जिसका असर उनके घरेलू खर्च पर भी पड रहा है। आधे वेतन पर घर के खर्चों के साथ-साथ बच्चों की पढाई, फीस व अन्य चीजों पर होने वाला व्यय आने वाले समय में सिर का बोझ बन सकता है जिससे लोग मानसिक रूप से परेशान हो रहे हैं। हालांकि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि इस दौरान कोई भी फीस अथवा किश्त देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा लेकिन यह खर्च बाद में तो देना ही पडे़गा जिसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। कई लोगों का कहना है कि आय के स्तर को देखते हुए सरकार को कम से कम विद्यालयों की फीस माफी पर तो ठोस कदम उठाने चाहिए जिससे कुछ हद तक परिवारों के व्यय का बोझ कम हो सके। हालांकि जिले में कुछ फैक्ट्रियों का संचालन शुरू हो चुका है और इनके मालिकों ने अपने यहां काम करने वाले श्रमिकों के वेतन में कटौती न करने व उनकी सहायता करने का भी आश्वासन दिया है।